गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

भारतीय लोकरंग के विविध रंग

भारतीय पर्वों, लोकगीतों और लोकोत्सव में एक आन्तरिक लय होती है, इन्ही  में लोकनाट्य भी आते हैं जो सभी विधाओ, कलाओं से  मिलकर भी
 अपना अलग-अलग महत्व रखती हैं !इनके प्रदर्शन में अक अनुष्ठान की तरह ही सामूहिकता इनकी ताकत होती है !रामनगर की रामलीला ,कानपूर 
की नौटंकी,मध्य प्रदेश का छऊ,बंगाल का जात्रा ,कर्नाटक का यक्षगान इत्यादी सभी जगह लोकनाट्यों में एक देशव्यापी एक सूत्रता देखि जा सकती है,
लोकधर्मी नाटकों के मूल में ग्रामजीवन की  सी आक्रत्रिमता रही है!
             लोकनाटक स्वाभाविक रहे हैं हमेशा से जमीन से जुड़े, प्रदेश विशेष के संस्कारो से इनमे विविधता रहती है रामनगर की रामलीला ,कानपूर की
 नौटंकी,महाराष्ट्र का तमाशा,लावनी और कर्नाटक के यक्षगान की अपनी अलग पहचान और अलग अंदाज़ रहा है !
भारतीय सिनेमा में भी लोक शैलियों की जीवन्तता की झलक मिलती रही है !इनका निजी शास्त्र मनोरंजन और भाव की अधिकता के साथ अपनी 
सामूहिक गतिशीलता का परिचय फिल्मे में भी देती है जैसे मराठी फिल्म 'नटरंग'!लेकिन आज का समय उत्तर आधुनिकता का है आज बाजार के सामान 
के प्रचार का माध्यम इन्हें बनाया जा रहा है इसके लिए इनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा जिम्मेदार है,अब ऐसे में देखना ये होगा  कि क्या वास्तव में लोक 
द्वारा निर्मित हमारे ये नाट्य हमारी संस्कृति के रहेंगे या ये भी 'तकनीक'और 'मशीन'की गिरफ्त में आ जायेंगे,और ये बात भी सच है कि'कलाओं का फ्यूजन
तो होना ही है ,पहले भी हुआ और भविष में भी होगा!पहले भी श्रेष्ठ बचा रहा था आज भी बचा रहेगा !'हम अपनी परम्परा के श्रेष्ठ भाग के बचे रहने की उम्मीद 
हैं करते  भविष्य के लिए....                                                                                                                                                            
                                                                 

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