शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

पुस्तक 'हिंदी सिनेमा टी वि और नाटकों में दलित दस्तक'

’हिंदी सिनेमा टी.वी और नाटकों में दलित दस्तक’ डॉ. सुधीर सागर द्वारा लिखित एक ऐसी पुस्तक है, जो प्रदर्शनकलाओं में दलितों की दस्तक का मूल्याकंन करती है। यह एक शोधरूपी दस्तावेज है, जो दलित जगत के कलाकारों के इतिहास से वर्तमान तक की तस्वीर पेश करती है। डॉ. सुधीर सागर स्वंय पेशे से चिकित्सक हैं लेकिन यह इनकी रूची और दलित समाज के प्रति समर्पण ही कहना चाहिए जो उन्होंने इतने कठीन कार्य को अंजाम दिया।
      हम सब जानते हैं कि दलित समाज या कहें आर्थिक, सामाजित रूप से कमजोर तबके की सबसे पहली जरूरत रोजी-रोटी और आत्मसम्मान है। ऐसे में अगर कोई ऐसा वर्ग अपनी रोटी की जरूरत के साथ वर्तमान के सबसे ताकतवर संचार माध्यमों के द्वारा स्वंय को प्रस्तुत कर पाता है तो यह बहुत बड़ी बात मानी जानी चाहिए। इस पुस्तक में दलित समाज के जितने भी रंगकर्मी, सिने सिंतारों व लेखकों की सूची पेश की गई है, वो सभी वाकई स्थापित और ख्याति प्राप्त कलाकार हैं। यहाँ कुछ कलाकारों का जीवन परिचय हमें अध्ययन के दौरान चौंका देता है, जैसे किसी का भारतीय रेलवे में होने के बावजूद व किसी का चिकित्सा क्षेत्र में होने के बावजूद रगंमंच व सिनेमा में सक्रिय होना...।
      प्रस्तुत पुस्तक हमारी सिनेमा व रंगमंच के महान सितारों से बड़े सहज तरिके से परिचय कराती है इनमें प्रमुख हैं- गीतकार शैलेन्द्र, चिराग पासवान, अजयलाल, भारूलता कांबले, रत्नकुमार सांभरिया, दर्शन कुमार, सविता पारमिता, व देव कुमार...। पुस्तक हमें भारतभर के रंगजगत व सिनेमा जगत में कार्य कर रहे दलित पृष्ठभूमि के कलाकारों, निर्देशकों, प्रोड्यूसरों व लेखकों को उनके जन्म शिक्षा-दीक्षा व वर्तमान भविष्य की प्लानिंग से बड़े सहज तरीके से परिचित कराती है।
आज का आधुनिक दौर विमर्शों का दौर है। ऐसे में आज सभी तरह के इतिहास तक को पुन:लिखने की बात कही जा रही है। ऐसे में हिंदी के समस्त संचार माध्यमों में देश की आधी आबादी  की उपस्थिति का ब्यौरा रखना भी बेहद जरुरी हो चला है। लेखक भूमिका में लिखते हैं कि हिंदी सिनेमा, टी.वी और नाटकों में दलित की कितनी भागीदारी है, इसका लेखा-जोखा या दस्तावेज नहीं है। हम लोंगों को पता नहीं है। फलां फिल्म का लेखक दलित है। फलां नाटक का निर्देशक दलित हैं। हिंदी सिनेमा T.V. और नाटकों में दलित की भागीदारी है लेकिन संवाद हीनता के कारण जानकारी नहीं है।
      शोध और खोज का परिणाम यह पुस्तक समाज में रहकर संघर्ष कर उभरते कलाकारों को बड़े तटस्थ और वैज्ञानिक तरिके से पेश करती है। दलित साहित्य में कई स्थानों पर भावों की प्रधानाता के चलते आंकलन एक तरफा रह जाता रहा है, लेकिन यहाँ ऐसा कतई नहीं है और एक बेहद जरूरी बात यह भी है कि यह पुस्तक बाजार में ठीक उस समय आयी हैं जब भारतीय सिनेमा अपने जन्म के 100 वर्ष मना रहा है।
भारतीय सिनेमा पर आज भारत भर में गोष्ठी और विमर्शों झड़ी लगी हुई हैं। ऐसे में यह पुस्तक भारतीय सिनेमा और रंग जगत के लिए खासी महत्वपूर्ण हो जाती है। भूमिका में लेखक लिखते कहता है दलित विषय पर प्रमुखता से फिल्म नहीं बनी है। गिनती की कुछ फिल्मों  का नाम लिया जा सकता है। टेलीविजन (दूरदर्शन एवं चैनल) पर दलित विषय प्रमुखता से धारावाहिक में नहीं दिखाया गया है। देश के कोने-कोने में नाट्य महोत्सव मनाया जाता है लेकिन कुछ नाटकों को छोड़कर सभी गैरदलित विषयों को प्रस्तुत करते हैं।ये बात स्वंय लेखक मानता है।
पुस्तक में अध्यायीकरण के नाम पर लेखक वरीयता क्रम का इस्तेमाल करता नजर आता है। मसलन लेखक जिसे पहले रख रहा है उससे उसके सिनेमा और रंगमंच की सक्रियता का एक अनुमान लगाया जा सकता है। सबसे पहले लेखक बहुत महान गीतकार शैलेन्द्र से हमारा परिचय कराते हैं। इस परिचय से हमें ऐसे बहुत से पहलुओं और संघर्षो का पता चलता है जिसे अभी तक सिनेमा जगत में लोग नहीं जान पाये थे। शैलेन्द्र के दलित होने की बात भी बहुत समय बाद ही लोगों तक पहूँची थी। इसी क्रम में ओमप्रकाश वाल्मीकि एक ऐसे हस्ताक्षर के रूप में आते हैं। दिल्ली दूरदर्शन ने दलित समाज पर असाधारण कार्यों को करने वाले लोगों को लेकर जो डाक्य़ूमेंट्री बनाई है, उनमें ओमप्रकाश वाल्मीकी भी एक है। साहित्य के साथ रंगमंच में उनकी सक्रिय  भागीदारी को पुस्तक में बखूबी पेश करती है। इसी तरह मोहनदास नैमिशराय ने सौ से भी ज्यादा रेडियों नाटकों की स्क्रिप्ट रची, परिवार नियोजन की पंचलाइन छोटा परिवार, सुखी परिवार, उन्हीं की दी हूई है। नैमिशराय के नाटक कहाँ मंचित हुए उनकी कहानी क्या थी व उनकी दो रेडियो स्क्रिप्ट को भी यहाँ जोड़ा गया है, जो बेहद उपयोगी हैं। इसी तरह फिल्मों की दुनिया में चिराग पासवान का प्रवेश भी ‘मिले न मिले हम’ के माध्यम से हिंदी फिल्मों में पहले दलित नायक के रुप में होता है। चिराग का प्रवेश अपने आप में खास है। कानपूर के देव कुमार ने ’अपना थियेटर नाट्य’ संस्था के माध्यम से दलित पीड़ा को अभिनय, लेखन, व चित्रकारी के माध्यम से व्यक्त किया। देव कुमार ने एक चर्चित नाटकदासता’ का लेखन व निर्देशन किया है, जिसे U.P. की नौंटकीं शैली में विभिन्न स्थानों पर मंचित किया गया। नाटक ‘दासता’ की स्क्रिप्ट भी यहाँ देवकुमार के परिचय में जोडी गई है। इसी तरह देव हर्ष प्रोडक्शन की संस्थापक भारूलता कांबले दलित सिनेमा को विकसित करने के लिए 2 करोड़ की लागत से तैयार सावित्रीबाई फुले पर फिल्म तैयार कर रहीं हैं। फिल्म जगत में युवा उर्जा की कमी नजर नहीं आती है। सविता पारमिता ftii से हैं और उनकी तरह ओर भी अनेक दलित युवा हैं, जो दलित सिनेमा को अलग पहचान दिलाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं, लेकिन सविता पारमिता का महत्व सिनेमा में दलित पात्रों को लेकर लिख रहीं पुस्तक ‘जाति के परिप्रेक्ष्य में सिनेमा’ से है। ओमप्रकाश वाल्मीकी की पत्नि चन्दा खैरवाल रंगमंच पर लंबे समय से सक्रिय है, डॉ. सुबोध कांबले सर्जन होने के बावजूद अभिनय में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का खिताब पा चूके हैं। अजय लाल (एके लाल) भारतीय रेलवे में कार्यरत (I.R.S.) है, किन्तु 20 से अधिक नाटकों में हिस्सा ले चुके हैं। इनकी आवाज ने फिल्मी दुनिया में अलग पहचान बनाई। दर्शन कुमार शिक्षक हैं लेकिन टी.वी. जगत के लिए विशिष्ट हैं, इन्होंने T.V जगत के लिये नय़ी सर्जनाओं को जन्म दिया। रूपनारायण सोनकर ने दलित समस्याओं पर लगातार लेखन कार्य किया। एके सिंह ने जूनूनी बनाकर अम्बेडकर और बुध्द को जन-जन तक रंगमंच के माध्यम से पहुँचाया है। रत्नकुमार सांभरिया की कहानी पर जयपूर दूरदर्शन ने एक टेलीफिल्म ‘मैं जीती’ का प्रसारण किया, ये रंगमंच पर सक्रिय हैं। भूपेन्द्र सिंह, सूरजपाल चौहान, सुशीला टांकभौरे के नाटकों ने दलित रंगमंच की नींव को मजबूती दी है जिस पर आज सिनेमा और दलित रंगमंच का एक मजबूत भवन बनता नजर आ रहा है।
अत: हम देखते है कि ये लेखक का मौलिक शोध रूपी प्रयास हैं, जिसमें विभिन्न स्रोतों से सामग्री एकत्र की गई है जिसे लेखक डॉ. सुधीर सागर ने यथा स्थान पर स्पष्ट भी किया है। तमाम खूबी के बावजूद अगर हम इस पुस्तक की कमी पर नजर ड़ालें तो हमें अध्ययन के दौरान कुछ कमियाँ नजर आती हैं जैसे- यहाँ उन तमाम दलित रंगमंच व सिनेमा के लिए कार्य कर रहे कलाकारों की तस्वीरें नहीं हैं, अगर यहाँ कलाकार, लेखक, निर्देशक के परिचय शिक्षा-दीक्षा के साथ उसकी तस्वीर भी रखी जाती तो पुस्तक की एक बड़ी कमी दूर हो सकती थी। सिनेमा, रंगमंच जैसे माध्यम पर पुस्तक होने के बावजूद यहाँ उनकी तस्वीरोंका अभाव है। बाकि हमें इस पुस्तक का स्वगत करना चहिये और इसके साथ ही हम भविष्य में भी चाहेंगें की डॉ. सुधीर सागर दलितों के दस्तखों को लेकर ओर विस्तृत क्षेत्र में शोध करते रहें। भविष्य में हम उनकी इसी तरह की दलित समाज के अनुसंधानपरक के दस्तावेजों की प्रतिक्षा करते हैं।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

भारतीय लोकरंग के विविध रंग

भारतीय पर्वों, लोकगीतों और लोकोत्सव में एक आन्तरिक लय होती है, इन्ही  में लोकनाट्य भी आते हैं जो सभी विधाओ, कलाओं से  मिलकर भी
 अपना अलग-अलग महत्व रखती हैं !इनके प्रदर्शन में अक अनुष्ठान की तरह ही सामूहिकता इनकी ताकत होती है !रामनगर की रामलीला ,कानपूर 
की नौटंकी,मध्य प्रदेश का छऊ,बंगाल का जात्रा ,कर्नाटक का यक्षगान इत्यादी सभी जगह लोकनाट्यों में एक देशव्यापी एक सूत्रता देखि जा सकती है,
लोकधर्मी नाटकों के मूल में ग्रामजीवन की  सी आक्रत्रिमता रही है!
             लोकनाटक स्वाभाविक रहे हैं हमेशा से जमीन से जुड़े, प्रदेश विशेष के संस्कारो से इनमे विविधता रहती है रामनगर की रामलीला ,कानपूर की
 नौटंकी,महाराष्ट्र का तमाशा,लावनी और कर्नाटक के यक्षगान की अपनी अलग पहचान और अलग अंदाज़ रहा है !
भारतीय सिनेमा में भी लोक शैलियों की जीवन्तता की झलक मिलती रही है !इनका निजी शास्त्र मनोरंजन और भाव की अधिकता के साथ अपनी 
सामूहिक गतिशीलता का परिचय फिल्मे में भी देती है जैसे मराठी फिल्म 'नटरंग'!लेकिन आज का समय उत्तर आधुनिकता का है आज बाजार के सामान 
के प्रचार का माध्यम इन्हें बनाया जा रहा है इसके लिए इनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा जिम्मेदार है,अब ऐसे में देखना ये होगा  कि क्या वास्तव में लोक 
द्वारा निर्मित हमारे ये नाट्य हमारी संस्कृति के रहेंगे या ये भी 'तकनीक'और 'मशीन'की गिरफ्त में आ जायेंगे,और ये बात भी सच है कि'कलाओं का फ्यूजन
तो होना ही है ,पहले भी हुआ और भविष में भी होगा!पहले भी श्रेष्ठ बचा रहा था आज भी बचा रहेगा !'हम अपनी परम्परा के श्रेष्ठ भाग के बचे रहने की उम्मीद 
हैं करते  भविष्य के लिए....                                                                                                                                                            
                                                                 

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

रामलीला : एक संक्षिप्त टिप्पणी

     रंगमंच की परम्परा बहुत प्राचीन रही है और इसी में रंगजलसों,रंगमहोत्सवों की परम्परा भी देखी जा सकती है |
हिंदुस्तान  में रंगमंच की शुरुआत ही  पारंपरिक लोकनाट्यों से  हुई,और ठीक इसी तर्ज़ पर उनके महोत्सवों की परम्परा हमे 
मिलती रही है | वर्तमान सन्दर्भ में हम बरसों से चली आ रही पारंपरिक लोक नाट्यों की सबसे समृद्ध और 'पॉपुलर' रामलीला
को देख सकते हैं 
                                                                               |रामलीला मध्यकाल से ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति के अनुरूप मंचित होती आ रही है |रामलीला एक लीला परक लोकरंग महोत्सव है | इसके केंद्र में धार्मिक और मनोरंजक दोनों ही तरह की भावनाएं साथ-साथ कार्य करती आ रही हैं.|रामलीला समूचे भारत भर में अक्टुबर के महीने में मंचित की जाती है, दशहरे का नाम लेते ही हमारे सामने एक बड़ा उत्सव साकार हो जाता है जिसके सेकड़ो हजारों नियमित दर्शक है. | समय के बदलाव के साथ रामलीला के मूल रूप में अनेक बदलाव  आये हैं |रामलीला का महोत्सव आज भारत भर  में एक 'कल्चरल रिचुअल' की तरह लोकमानस  में जगह बनाया हुआ है.|रंगमहोत्सवों की बात करते समय हमें अपने पारम्परिक लोकनाट्यों की स्थिति का जायजा जरूर लेना चाहिए
जो आज भी नियमित रूप से कायम हैं जिनमें रामलीला बेहद खास है |