बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

रामलीला : एक संक्षिप्त टिप्पणी

     रंगमंच की परम्परा बहुत प्राचीन रही है और इसी में रंगजलसों,रंगमहोत्सवों की परम्परा भी देखी जा सकती है |
हिंदुस्तान  में रंगमंच की शुरुआत ही  पारंपरिक लोकनाट्यों से  हुई,और ठीक इसी तर्ज़ पर उनके महोत्सवों की परम्परा हमे 
मिलती रही है | वर्तमान सन्दर्भ में हम बरसों से चली आ रही पारंपरिक लोक नाट्यों की सबसे समृद्ध और 'पॉपुलर' रामलीला
को देख सकते हैं 
                                                                               |रामलीला मध्यकाल से ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति के अनुरूप मंचित होती आ रही है |रामलीला एक लीला परक लोकरंग महोत्सव है | इसके केंद्र में धार्मिक और मनोरंजक दोनों ही तरह की भावनाएं साथ-साथ कार्य करती आ रही हैं.|रामलीला समूचे भारत भर में अक्टुबर के महीने में मंचित की जाती है, दशहरे का नाम लेते ही हमारे सामने एक बड़ा उत्सव साकार हो जाता है जिसके सेकड़ो हजारों नियमित दर्शक है. | समय के बदलाव के साथ रामलीला के मूल रूप में अनेक बदलाव  आये हैं |रामलीला का महोत्सव आज भारत भर  में एक 'कल्चरल रिचुअल' की तरह लोकमानस  में जगह बनाया हुआ है.|रंगमहोत्सवों की बात करते समय हमें अपने पारम्परिक लोकनाट्यों की स्थिति का जायजा जरूर लेना चाहिए
जो आज भी नियमित रूप से कायम हैं जिनमें रामलीला बेहद खास है |

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